“घास की रोटी मंजूर थी, लेकिन गुलामी नहीं” — छपरा में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप को हजारों लोगों ने किया नमन
छपरा की धरती शनिवार को वीरता, स्वाभिमान और शौर्य के रंग में रंगी दिखी। मौका था वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की जयंती का, जहां शहर के क्षत्रिय निवास राजपूत स्कूल में भव्य आयोजन हुआ। सारण जिले के कोने-कोने से पहुंचे हजारों लोगों ने पुष्प अर्पित कर, तिलक लगाकर और जयघोष के साथ उस वीर योद्धा को याद किया, जिसने कभी गुलामी स्वीकार नहीं की।
कहते हैं इतिहास उन्हीं का होता है जो हालात से समझौता नहीं करते, और महाराणा प्रताप ऐसा ही नाम हैं। वो राजा, जिसने महलों की जगह जंगल चुना, शाही भोजन की जगह घास की रोटी खाई, लेकिन मातृभूमि की आन-बान-शान पर कभी आंच नहीं आने दी। आज सैकड़ों साल बाद भी उनका नाम सिर्फ

इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में जिंदा है।
कार्यक्रम में क्षत्रिय समाज के अलावा अन्य समाजों के लोग भी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। मंच से वक्ताओं ने महाराणा प्रताप के संघर्ष, त्याग और राष्ट्रभक्ति को याद करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व और आदर्शों को जानने की जरूरत है। उनके घोड़े चेतक की वीरता की कहानी भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रही।

इस मौके पर समाज के विकास, एकता और विकसित भारत के निर्माण को लेकर भी चर्चा हुई। लोगों ने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन सिर्फ क्षत्रिय समाज के लिए नहीं, बल्कि हर भारतीय के लिए प्रेरणा है।
छपरा की धरती से एक बार फिर यही संदेश गया — वीर कभी मरते नहीं, वे पीढ़ियों को लड़ना और झुकना नहीं सिखाते हैं।

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