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राजगीर- पटना एक्सप्रेस की असली कहानी

“भाई साहब… अगला स्टेशन ही उतरना है… थोड़ा बैठने दीजिए…”
आप थोड़ा सख्त होते हैं।
तभी दूसरा आदमी आता है—
“भाई साहब, बच्चे छोटे हैं… बैठने दीजिए…”
फिर तीसरी आवाज—
“पत्नी है साथ में… बस थोड़ा जगह दे दीजिए…”
और तभी आपको एहसास होता है—
आप अपनी ही बर्थ पर…
मेहमान बन चुके हैं।
मेजबान कोई और है।
यह किसी जनरल डिब्बे की कहानी नहीं है।
यह AC कोच की हालत है।
यह एक रेगुलर एक्सप्रेस ट्रेन है।
नाम है—13353 राजगीर–पटना एक्सप्रेस।
समय तय है।

दोपहर 3:10 बजे राजगीर से चलती है।
शाम 7 बजे पटना पहुंचती है।
सब कुछ सामान्य लगता है।
जैसा एक एक्सप्रेस ट्रेन में होना चाहिए।
आप सफर से पहले मोबाइल खोलते हैं।
रनिंग स्टेटस देखते हैं।
वहां लिखा होता है—
सीटें खाली हैं।
AC में भी…
स्लीपर में भी।
आपको भरोसा होता है—
आज का सफर ठीक रहेगा।
लेकिन…
कहानी यहीं से बदलती है।
जैसे ही आप ट्रेन में चढ़ते हैं—
एक दूसरा सच सामने आता है।
भीड़।
सिर्फ भीड़।
जनरल कोच की बात छोड़िए—
स्लीपर और AC कोच भी उसी भीड़ में डूबे हुए।
जिस सीट को मोबाइल “खाली” बता रहा था,
वह सीट पहले से भरी हुई है।
एक नहीं…
चार–पांच लोग बैठे हैं।
ऊपर… नीचे… साइड…

हर जगह।
अब सवाल उठता है—
मोबाइल पर जो “खाली” दिख रहा था,
वह हकीकत में भरा हुआ कैसे है?
क्या सिस्टम गलत है?
या जमीन पर कुछ और ही चल रहा है?
बताया जाता है—
इस रूट पर बड़ी संख्या में लोग बिना टिकट सफर करते हैं।
यानी AC कोच में भी बिना टिकट लोग पहुंच जाते हैं।
आप अपनी सीट देखते हैं—
आपका नाम उस पर लिखा है।
लेकिन उस पर आपका हक नहीं है।
आप अटेंडेंट को कॉल करते हैं।
नंबर कोच में चिपका है।
कॉल जाता है…
लेकिन जवाब नहीं आता।
चादर मिलती है—
मुड़ी हुई।
कंबल—जैसे महीनों से किसी ने ध्यान नहीं दिया।
आप TTE को ढूंढते हैं।
काफी देर बाद मिलते हैं।
जब आप बताते हैं कि आप पत्रकार हैं—
तब सिस्टम थोड़ा हरकत में आता है।
लेकिन फिर एक सवाल खड़ा होता है—
क्या व्यवस्था अब पहचान पर चलती है?
अगर आप आम यात्री हैं—
तो क्या आपकी सीट… आपकी नहीं है?
इस पूरी यात्रा में एक अजीब सच्चाई सामने आती है—
आप टिकट लेकर भी
“बिना टिकट” जैसा अनुभव करते हैं।
और जो बिना टिकट हैं—
वे आराम से आपकी सीट पर बैठे हैं।
तो फिर फर्क क्या बचा?
यह सिर्फ एक ट्रेन की कहानी नहीं है।
यह उस सिस्टम की कहानी है—
जहां नियम मौजूद हैं…
लेकिन उनका असर नहीं।
रेलवे से सवाल है—
अगर सीटें भरी हुई हैं,
तो ऐप खाली क्यों दिखाता है?
अगर बिना टिकट यात्रा इतनी आसान है,
तो टिकट लेने की जरूरत क्या है?
और अगर चेकिंग है—
तो दिखती क्यों नहीं?
राजगीर से पटना के बीच
यह सफर सिर्फ दूरी का नहीं है—
यह भरोसे और हकीकत के बीच का सफर है।
अब सवाल आपसे—
क्या आपने भी इस रूट पर ऐसा अनुभव किया है?

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