बिहार में एक अस्पताल बन रहा है… नेत्र चिकित्सा का बड़ा केंद्र। 150 करोड़ रुपये का निवेश। नाम है—ACE। पीछे हैं गौतम अदाणी। और यह सिर्फ बिहार नहीं, देशभर के लिए 500 करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता का हिस्सा बताया जा रहा है।
अब ज़रा रुकिए…
सवाल अस्पताल बनने पर नहीं है। सवाल यह है कि क्या इस देश में अब जनसेवा और बड़े सामाजिक प्रोजेक्ट का चेहरा सिर्फ दो नाम होंगे—अदाणी और अंबानी?
क्योंकि खबर में जो चमक है, उसके पीछे कुछ सवाल छूट जाते हैं।

बिहार में अगर 150 करोड़ का नेत्र अस्पताल बन सकता है, तो क्या बिहार सरकार के पास ऐसी इच्छा, व्यवस्था या प्राथमिकता नहीं है? क्या सरकारी अस्पतालों में आंखों के इलाज की व्यवस्था इतनी कमजोर है कि अब कॉरपोरेट समूहों को आगे आना पड़े?
कहा गया कि हर साल 3.3 लाख आंखों की सर्जरी होगी। 1000 हेल्थ प्रोफेशनल ट्रेन होंगे। सुनने में बहुत बड़ा सपना लगता है। लेकिन सवाल सपना नहीं, सिस्टम का है।
क्या यहां दुनिया के बेहतरीन नेत्र विशेषज्ञ आएंगे? क्या गांव के गरीब को वही गुणवत्ता मिलेगी, जो बड़े शहरों के निजी अस्पताल में मिलती है? क्या सस्ता इलाज सिर्फ एक नारा होगा, या वाकई अच्छी क्वालिटी के लेंस, आधुनिक तकनीक और अनुभवी डॉक्टर उपलब्ध होंगे?
और एक सवाल यह भी…

जब किसी राज्य में बिजली, गैस, स्मार्ट मीटर, सीमेंट, अस्पताल—हर सेक्टर में एक ही समूह का प्रभाव बढ़ने लगे, तब लोकतंत्र में सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि निवेश अच्छी बात है, लेकिन क्या सरकार की भूमिका सिर्फ भूमि पूजन तक सीमित रह जाएगी?
अदाणी समूह ने बिहार में करीब 40 हजार करोड़ निवेश की बात कही है। पीरपैंती में पावर प्लांट, अस्पताल, स्मार्ट मीटर, गैस नेटवर्क… सूची लंबी है। लेकिन बिहार के लोग पूछ सकते हैं—इतना निवेश होने के बाद क्या रोजगार, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं में उतनी ही तेजी से बदलाव दिखेगा?
और सबसे अहम बात…
अगर सेवा ही साधना है, तो सेवा का केंद्र कॉरपोरेट क्यों बने? सरकार क्यों नहीं?
अस्पताल बने, इलाज हो, गरीब की आंखों की रोशनी लौटे—इससे बेहतर क्या हो सकता है। लेकिन लोकतंत्र में ताली के साथ सवाल भी ज़रूरी है।
क्योंकि सवाल पूछना विरोध नहीं होता… जवाबदेही की शुरुआत होता है।

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