कुछ चिताएँ आग से जलती हैं, कुछ चिताएँ दर्द से जलती हैं।
और कुछ चिताएँ ऐसी होती हैं, जिन पर लोग जिंदा लेट जाते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बचा रहे।
नमस्कार,
यह भारत है।
वही भारत, जहाँ एक आदिवासी बेटी आज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठी है। महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।
वही भारत, जहाँ देश की आर्थिक नीतियों की कमान एक महिला, निर्मला सीतारमण के हाथों में है।
वही भारत, जहाँ महिला सशक्तिकरण की कहानियाँ लिखी जाती हैं, बेटियों के सम्मान की बातें होती हैं, और संसद से लेकर पंचायत तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के दावे किए जाते हैं।
लेकिन इसी भारत के एक कोने में…
कुछ महिलाएँ चिता पर लेटी हुई हैं।
हाँ, आपने सही सुना।
चिता पर…

जहाँ सामान्यतः किसी मृत व्यक्ति को अंतिम विदाई दी जाती है, वहाँ मध्य प्रदेश की आदिवासी महिलाएँ जिंदा लेटकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं।
उनकी आँखों में आँसू हैं।
उनके चेहरों पर थकान है।
लेकिन उनके इरादों में एक सवाल है।
क्या विकास के नाम पर उनकी जमीन छीन ली जाएगी?
क्या उनकी नदी उनसे दूर कर दी जाएगी?
क्या उनके जंगल, उनके खेत, उनके पुरखों की यादें पानी में डूब जाएँगी?
और यही सवाल जन्म देता है एक आंदोलन को…
“चिता आंदोलन”
अब सवाल है कि आखिर यह केन-बेतवा लिंक परियोजना क्या है?
जिसके लिए महिलाएँ भूख हड़ताल पर हैं, चिता पर लेट रही हैं और देश का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही हैं।
केन-बेतवा लिंक परियोजना को भारत की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना कहा जाता है।
सरकार का कहना है कि इससे बुंदेलखंड क्षेत्र की पानी की समस्या दूर होगी।
लाखों हेक्टेयर भूमि को सिंचाई मिलेगी।
लाखों लोगों तक पीने का पानी पहुँचेगा।
बिजली उत्पादन होगा।
सूखे की मार झेल रहे इलाकों को राहत मिलेगी।
सरकारी नजरिए से देखें तो यह विकास की एक बड़ी कहानी है।
लेकिन दूसरी तरफ उन लोगों की कहानी है, जिनकी जमीन इस विकास की कीमत बन रही है।
केन नदी पर बनने वाला दौधन बांध कई गांवों और जंगलों को प्रभावित करेगा।
आदिवासी समुदायों का कहना है कि केवल जमीन नहीं डूबेगी।
उनकी संस्कृति डूबेगी।
उनकी पहचान डूबेगी।
उनकी पीढ़ियों की स्मृतियाँ डूब जाएँगी।
इसीलिए महिलाएँ चिता पर लेटी हैं।
क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर उनकी बात नहीं सुनी गई, तो उनका जीवन भी धीरे-धीरे उसी चिता में बदल जाएगा।
यहाँ सवाल सिर्फ एक बांध का नहीं है।
सवाल सिर्फ एक परियोजना का नहीं है।
सवाल यह है कि विकास का मॉडल कैसा हो?
क्या विकास लोगों को साथ लेकर चलेगा?
या फिर कुछ लोगों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाएगा?
आज चिता पर लेटी वह आदिवासी महिला राष्ट्रपति भवन को नहीं देख रही।
वह संसद भवन को नहीं देख रही।
वह किसी राजनीतिक दल को नहीं देख रही।
वह सिर्फ अपने बच्चों का भविष्य देख रही है।
वह सिर्फ अपनी मिट्टी बचाने की कोशिश कर रही है।
और लोकतंत्र में इससे बड़ा सवाल कोई नहीं होता।
सरकार के पास अपने तर्क हैं।
आंदोलनकारियों के पास अपने सवाल हैं।
फैसला समय करेगा कि कौन कितना सही था।
लेकिन इतिहास यह जरूर याद रखेगा कि जब विकास और विस्थापन की बहस चल रही थी, तब कुछ आदिवासी महिलाएँ चिता पर लेटकर देश से पूछ रही थीं—
“क्या हमारी जिंदगी की कीमत भी किसी सरकारी फाइल में दर्ज है?”
और शायद यही सवाल आज पूरे देश को सुनना चाहिए।

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