नमस्कार,
बिहार की राजनीति में आज एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसे देखकर सवाल उठता है कि चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है या गिरफ्तारी का मंच?
पटना के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में नामांकन का आखिरी दिन था। उम्मीदवार अपने-अपने समर्थकों के साथ लोकतंत्र की प्रक्रिया में हिस्सा लेने पहुंचे थे। लेकिन जैसे ही जनशक्ति जनता दल की उम्मीदवार वीणा मानवी नामांकन दाखिल कर बाहर निकलीं, पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। कुछ ही मिनटों में राजनीतिक चर्चा चुनाव से हटकर गिरफ्तारी पर आ गई।
लाइव तस्वीरों में दिखाई दिया कि वीणा मानवी को पुलिस वाहन में बैठाकर मेडिकल जांच के लिए भेजा जा रहा है। पुलिस का कहना है कि उनके खिलाफ पुराने मामले में गैर-जमानती वारंट था, जबकि वीणा मानवी और उनके समर्थकों का आरोप है कि यह कार्रवाई राजनीतिक दबाव में की गई है।
सोचिए…

अगर किसी उम्मीदवार को नामांकन के तुरंत बाद गिरफ्तार किया जाता है, तो खबर सिर्फ गिरफ्तारी की नहीं रहती। खबर यह भी बन जाती है कि चुनावी मैदान में मुकाबला अब वोटों से होगा या मुकदमों से?
वीणा मानवी कैमरे के सामने भावुक दिखीं। उन्होंने कहा कि अगर वह जेल से बाहर नहीं आ पाईं तो मतदाता भाजपा को वोट न दें। उन्होंने यहां तक कह दिया कि “प्रशांत किशोर को जिता दीजिए, कुत्ता-बिल्ली को जिता दीजिए, लेकिन भाजपा को मत जिताइए।” यह बयान अब चुनावी बहस का नया विषय बन चुका है।
उधर तेज प्रताप यादव ने इस कार्रवाई को साजिश बताया है और सरकार पर निशाना साधा है। गिरफ्तारी के कारणों को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो चुके हैं।
बांकीपुर में चुनाव तो होना ही है, लेकिन आज का दिन इस सवाल के नाम रहा—
क्या यह कानून की कार्रवाई थी?
या फिर चुनावी राजनीति का नया अध्याय?
फिलहाल जवाब अदालत, पुलिस और राजनीति—तीनों के पास है। लेकिन तस्वीरें यही बता रही हैं कि बांकीपुर का उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रहा, बल्कि बिहार की सबसे बड़ी राजनीतिक बहस बन चुका है।

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