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बाढ़, सांप और जर्जर स्कूल… आखिर कैसे पढ़ेंगे बिहार के बच्चे

“किताबों तक पहुंचने का रास्ता अगर पानी में डूब जाए,
तो सिर्फ सड़क नहीं डूबती… सपनों की एक पूरी पीढ़ी डूबने लगती है।”
“जहां स्कूल जाने से पहले बच्चों और शिक्षकों को शिक्षा नहीं, बल्कि जान बचाने की चिंता करनी पड़े… वहां सवाल सिर्फ एक विद्यालय का नहीं, पूरे व्यवस्था का होता है।”
नमस्कार…

जो दृश्य आप अपनी स्क्रीन पर देख रहे हैं, उसे जरा ध्यान से देखिए। यह किसी नदी का घाट नहीं है, न ही किसी बाढ़ग्रस्त इलाके का दृश्य। यह एक सरकारी विद्यालय तक पहुंचने का रास्ता है।
यह है एनपीएस महुआरी टोला, बनियापुर, सारण जिला का एक प्राथमिक विद्यालय।

मानसून अभी दस्तक भर दे रहा है। बरसात का लंबा मौसम अभी बाकी है। लेकिन शुरुआत में ही हालात ऐसे हैं कि शिक्षक स्कूल पहुंचने के लिए पानी से भरे रास्तों को पार करने को मजबूर हैं। कोई कपड़े संभालते हुए चल रहा है, कोई गिरने से बच रहा है, तो कोई सांप-बिच्छू के डर के बीच आगे बढ़ रहा है।
क्योंकि नौकरी का सवाल है।
स्कूल नहीं पहुंचे तो अनुपस्थित माने जाएंगे। जवाबदेही तय होगी। इसलिए जोखिम उठाकर भी स्कूल पहुंचना उनकी मजबूरी है।
लेकिन सवाल यह है कि जब शिक्षक ही इतनी कठिनाई से विद्यालय पहुंच पा रहे हैं, तो छोटे-छोटे बच्चे आखिर कैसे आएंगे?
जिन नन्हे कदमों को किताबों तक पहुंचना चाहिए, वे पानी और कीचड़ से जूझेंगे। जिन हाथों में कॉपी-किताब होनी चाहिए, वे गिरने से बचने की कोशिश करेंगे।
और जरा विद्यालय भवन की स्थिति भी देखिए।
दीवारें, परिसर और आसपास का माहौल खुद कई सवाल खड़े कर रहा है। यह दृश्य सिर्फ एक भवन की बदहाली नहीं दिखाता, बल्कि उस सोच की तस्वीर भी सामने रखता है, जिसमें शिक्षा अक्सर भाषणों में प्राथमिकता बनती है, लेकिन जमीन पर संघर्ष बन जाती है।
हर साल कहा जाता है कि शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो रही है। नए संकल्प, नई योजनाएं और नए दावे किए जाते हैं।
लेकिन अगर विद्यालय तक पहुंचने का रास्ता ही सुरक्षित नहीं है, तो उन दावों का अर्थ क्या रह जाता है?
सबसे ज्यादा चिंता उन शिक्षकों की है जो दूर-दराज के इलाकों से यहां पढ़ाने आते हैं। उनके भीतर भी उत्साह होता है, सपने होते हैं, बच्चों को आगे बढ़ाने का जज्बा होता है।
लेकिन जब रोज़ स्कूल पहुंचना ही एक चुनौती बन जाए, तो शिक्षा का वातावरण कैसे बनेगा?
सारण के इस विद्यालय की तस्वीर सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस अंतर को दिखाती है जो फाइलों में दर्ज विकास और जमीन पर दिखने वाली हकीकत के बीच मौजूद है।
आज बारिश की शुरुआत है।
अगर अभी यह स्थिति है, तो आने वाले दो-तीन महीनों में हालात क्या होंगे?
क्या बच्चे नियमित रूप से विद्यालय पहुंच पाएंगे?
क्या शिक्षक बिना डर के अपना दायित्व निभा पाएंगे?
और सबसे बड़ा सवाल…
क्या हम सचमुच अपने बच्चों को वह माहौल दे पा रहे हैं, जिसके दम पर हम बेहतर भविष्य की बात करते हैं?
अब आगे सुनिए, इस विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक और स्थानीय लोग इस स्थिति के बारे में क्या कहते हैं…
और आप भी बताइए…
क्या इस रास्ते से होकर आपके बच्चे रोज़ स्कूल जा सकते हैं?
अपनी राय कमेंट में जरूर लिखिए।
“क्योंकि शिक्षा का संकट सिर्फ एक स्कूल का संकट नहीं होता, वह आने वाले समाज का भविष्य तय करता है।”

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