छपरा के अड्डा नंबर-2 में अब बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतर रहा है।
कुछ दिन पहले तक जहां सरयू नदी का पानी घरों की चौखट तक पहुंच गया था, वहीं आज पानी सिमटकर खेतों, गलियों और नीची जमीनों में रह गया है। नदी यहां से करीब आधा किलोमीटर दूर बहती है, लेकिन इस बार उसका विस्तार लोगों के आंगन तक आ गया था।
बाढ़ का पानी कम होने के साथ लोगों की जिंदगी भी पटरी पर लौटने लगी है। बच्चे फिर से गलियों में दिख रहे हैं, लोग अपने घरों की सफाई में जुटे हैं, और रोजमर्रा का संघर्ष एक बार फिर शुरू हो चुका है।
लेकिन बाढ़ सिर्फ पानी नहीं छोड़ती, वह अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ जाती है।

पानी तो चला जाता है, लेकिन उसके बाद शुरू होता है बीमारियों का खतरा। जहां-जहां पानी जमा रह जाता है, वहां सड़ांध पैदा होने लगती है। यही सड़ांध मच्छरों को जन्म देती है। डेंगू, मलेरिया, टायफाइड और कई अन्य संक्रामक बीमारियां ऐसे ही हालात में फैलने लगती हैं।
आज भी कई जगहों पर पानी के छोटे-छोटे गड्ढे मौजूद हैं। लोग मजबूरी में उसी माहौल में रह रहे हैं, जिस माहौल में वे बाढ़ के दिनों में रह रहे थे। फर्क सिर्फ इतना है कि अब पानी कम है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं है।
ऐसे में जरूरत सिर्फ प्रशासन की नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों और आम लोगों की भी है। नगर निगम हो या ग्रामीण क्षेत्र, जहां-जहां बाढ़ का पानी आया था, वहां व्यापक सफाई अभियान, फॉगिंग और दवा के छिड़काव की आवश्यकता है।
क्योंकि बाढ़ का असली अंत तब नहीं होता जब पानी उतर जाता है। बाढ़ का अंत तब होता है, जब उसके बाद पैदा होने वाले खतरों से भी लोग सुरक्षित निकल जाएं।
मैं संजीव मिश्रा, अड्डा नंबर-2, छपरा से, eBihar DigitalNews के लिए।

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