“सुबह के 5 बजकर 45 मिनट…
जब ज्यादातर लोग नींद में थे…
कुछ लोग घर से निकले थे।
न किसी जश्न में जाना था…
न कहीं घूमने।
बस रोज़ की तरह… गंगा पार दियारा इलाके में जाना था।
परवल तोड़ने।
रोज़ी-रोटी कमाने।
लेकिन…

बाढ़ जिला के उमानाथ गंगा घाट पर शुरू हुआ यह सफर… कुछ परिवारों के लिए जिंदगी का सबसे बड़ा दुख बन गया।
करीब 14–15 लोग नाव पर सवार होकर गंगा पार जा रहे थे।
नाव घाट से थोड़ी ही दूरी पर पहुंची थी कि अचानक तेज हवा चलने लगी।
प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं…
हवा का एक तेज झोंका आया।
नाव डगमगाई।
संतुलन बिगड़ा…
और कुछ ही सेकेंड में नाव गंगा की तेज धारा में पलट गई।

फिर…
चारों तरफ सिर्फ चीखें थीं।
मदद की आवाजें थीं।
कोई अपने बच्चे को खोज रहा था…
कोई मां अपने बेटे का नाम पुकार रही थी…
कोई पानी से निकलने की जद्दोजहद कर रहा था।
कुछ लोग किसी तरह तैरकर बाहर आ गए।
कुछ को स्थानीय नाविकों ने बचाया।
कुछ लोगों को NDRF और SDRF की टीम ने सुरक्षित बाहर निकाला।
लेकिन…
हर कोई बच नहीं सका।
अब तक तीन शव बरामद हो चुके हैं।
मृतकों की पहचान श्रवण महतो, उनके पुत्र काशी कुमार, और नीला देवी के रूप में हुई है।
ज़रा ठहर कर सोचिए…
एक पिता…
जो शायद सुबह अपने बेटे के साथ कमाने निकला होगा।
सोचा होगा शाम को घर लौटेंगे…
कुछ पैसे आएंगे…
घर का चूल्हा जलेगा…
लेकिन गंगा ने…
एक ही परिवार के पिता और पुत्र दोनों को अपने भीतर समा लिया।
एक घर…
जहां अब शायद दरवाजा खुलेगा…
लेकिन लौटकर आने वाला कोई नहीं होगा।
और दर्द यहीं खत्म नहीं होता।
अब भी तीन से चार लोग लापता बताए जा रहे हैं।
SDRF की टीम लगातार गंगा में सर्च ऑपरेशन चला रही है।
परिजन घाट पर खड़े हैं…
आंखें नदी पर टिकी हैं…
उम्मीद और डर के बीच।
लेकिन सवाल फिर वही है…
क्या यह सिर्फ तेज हवा का हादसा है?
या फिर हमारी आदत बन चुकी लापरवाही की कीमत?
क्या नाव पर सुरक्षा इंतज़ाम थे?
क्या क्षमता से ज्यादा लोग बैठे थे?
क्या घाटों पर कोई चेतावनी व्यवस्था है?
या फिर…
गरीब आदमी की जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि हादसे के बाद सिर्फ अफसर पहुंचते हैं… सवाल नहीं।
तीन मौतें…
सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं।
यह एक पिता-पुत्र की टूटी हुई कहानी है।
एक परिवार का उजड़ जाना है।
और गंगा किनारे आज फिर वही सवाल खड़ा है…
क्या अगली नाव पलटने से पहले… कुछ बदलेगा?”

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