
पटना का कोचिंग अध्याय: क्या यह एक काला अध्याय बन जाएगा?
पटना…
एक ऐसा शहर, जहां लाखों सपने हर साल रेलवे, बीपीएससी, यूपीएससी और एसएससी की किताबों के बीच पलते हैं।
जहां माता-पिता खेत बेचकर, गहने गिरवी रखकर अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं।
लेकिन आज सवाल पढ़ाई का नहीं है।
सवाल है—क्या पटना की कोचिंग इंडस्ट्री अब शिक्षा का केंद्र है या वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा?
हाल के दिनों में जो कुछ हुआ, उसने पूरे बिहार को चौंका दिया। एक तरफ चर्चित शिक्षक खान सर का संस्थान, दूसरी तरफ ज्ञान बिंदु जीएस अकादमी के रौशन आनंद। आरोप, प्रत्यारोप, तोड़फोड़, गिरफ्तारी, जमानत और फिर एक संदिग्ध मौत। घटनाओं की यह श्रृंखला शिक्षा जगत के लिए असहज सवाल खड़े कर रही है।
सोचिए…

जिस शहर में क्लासरूम की पहचान ब्लैकबोर्ड से होनी चाहिए, वहां पहचान सीसीटीवी फुटेज और एफआईआर से होने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है।
जिस उद्योग ने बिहार के युवाओं को उम्मीद दी, वही अगर विवादों की सुर्खियों में आने लगे, तो नुकसान सिर्फ दो संस्थानों का नहीं होता।
नुकसान उस छात्र का होता है जो गांव से पटना आया है।
नुकसान उस पिता का होता है जिसने कहा था—”बेटा, बस पढ़ाई पर ध्यान देना।”
और सबसे बड़ा नुकसान होता है शिक्षा की विश्वसनीयता का।
खान सर और रौशन आनंद के बीच चल रहे विवाद ने यह भी दिखाया कि बिहार की कोचिंग इंडस्ट्री कितनी बड़ी आर्थिक और सामाजिक ताकत बन चुकी है। प्रतिस्पर्धा नई नहीं है, लेकिन जब प्रतिस्पर्धा संघर्ष में बदलने लगे, तब पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में आ जाता है।
अब इस कहानी में एक और मोड़ आया।
रौशन आनंद के भाई प्रिंस यादव, जिनका नाम विवाद से जुड़े मामले में सामने आया था, नेपाल के एक होटल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए। पुलिस जांच जारी है और कई सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा सवाल वही है—
क्या आने वाले वर्षों में इतिहास लिखेगा कि पटना की कोचिंग इंडस्ट्री ने लाखों अफसर दिए…

या फिर यह भी लिखा जाएगा कि कभी यहां शिक्षा के नाम पर ऐसा दौर आया था जिसे “पटना कोचिंग का काला अध्याय” कहा गया?
क्योंकि किताबों से निकलने वाली रोशनी अगर विवादों के धुएं में खो जाए, तो नुकसान किसी एक शिक्षक या संस्थान का नहीं होता…
नुकसान पूरे समाज का होता है।
*और यही इस कहानी का सबसे बड़ा सवाल है।*
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