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JPU Controversyकुलपति पर मोबिल फेंका, मचा हड़कंप

नमस्कार…
यह तस्वीर किसी राजनीतिक रैली की नहीं है, किसी सड़क पर हो रहे विरोध प्रदर्शन की भी नहीं है। यह घटना हुई है उस जगह पर, जिसे हम शिक्षा का मंदिर कहते हैं — छपरा के जयप्रकाश विश्वविद्यालय में।
मंगलवार की दोपहर। कुलपति प्रो. (डॉ.) परमेंद्र कुमार बाजपेई विश्वविद्यालय परिसर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। प्रतिमा से आगे बढ़ते हैं, प्रशासनिक भवन की ओर। तभी कुछ लोग आते हैं और उन पर मोबिल यानी काला तेल फेंक देते हैं।
सवाल यह नहीं है कि तेल किसने फेंका।
सवाल यह है कि विश्वविद्यालय में आखिर ऐसा माहौल क्यों बन गया है कि कुलपति तक सुरक्षित नहीं हैं?

सवाल यह भी है कि जब परिसर में सुरक्षा व्यवस्था मौजूद थी, तब हमलावर आराम से आए और आराम से भाग भी गए।
और जब पुलिस जांच के लिए पहुंचती है तो पता चलता है कि कई सीसीटीवी कैमरे बंद पड़े हैं।
यानी विश्वविद्यालय में कैमरे भी हैं… लेकिन देखने के लिए नहीं।
सुरक्षा भी है… लेकिन बचाने के लिए नहीं।
और व्यवस्था भी है… लेकिन काम करने के लिए नहीं।
अब ज़रा इस घटना के पीछे की परतों को समझिए।

जेपी यूनिवर्सिटी का नाम वर्षों से विवादों में रहा है। छात्रों की शिकायत रही है कि तीन साल का कोर्स छह-सात-आठ साल में पूरा होता है। परीक्षा समय पर नहीं होती। रिजल्ट लटकता रहता है। फाइलें घूमती रहती हैं। और छात्रों के बीच यह धारणा भी गहरी होती गई कि बिना पैसे कई काम नहीं होते।
इन आरोपों की जांच और सत्यापन अपनी जगह है, लेकिन इतना जरूर है कि विश्वविद्यालय के खिलाफ असंतोष नया नहीं है।
विरोध भी वर्षों से होता रहा है।
धरना हुआ।
प्रदर्शन हुआ।
नारे लगे।
ज्ञापन दिए गए।
लेकिन विरोध और हमला — दोनों एक चीज नहीं होते।
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन किसी व्यक्ति पर काला तेल फेंकना, अपमानित करने की कोशिश करना, यह विरोध नहीं है।
यह अराजकता है।
और अगर कोई अपनी बात मनवाने के लिए इस रास्ते पर उतरता है, तो वह खुद अपने मुद्दे को कमजोर कर देता है।
दिलचस्प बात यह है कि यह पहली घटना भी नहीं है।
जेपी यूनिवर्सिटी में इससे पहले भी पूर्व कुलपति डी.के. गुप्ता पर मोबिल फेंका जा चुका है।
एक अन्य पूर्व कुलपति जितेंद्र सिंह पर जूता उछाला गया था।
मतलब हर कुछ वर्षों में कुलपति बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन घटनाएं नहीं बदलतीं।
तो सवाल उठता है…
क्या समस्या सिर्फ व्यक्ति में है?
या फिर व्यवस्था इतनी बीमार हो चुकी है कि हर नया कुलपति उसी गुस्से और अव्यवस्था का सामना करने को मजबूर है?
और अगर बार-बार ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो फिर सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासन आखिर सबक क्यों नहीं ले रहा?
क्यों कैमरे बंद हैं?
क्यों उपद्रवी पहचान से बाहर हैं?
और क्यों शिक्षा का परिसर धीरे-धीरे संघर्ष और अव्यवस्था का मैदान बनता जा रहा है?
फिलहाल पुलिस जांच कर रही है।
एफआईआर की तैयारी है।
दोषियों की तलाश जारी है।
लेकिन इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बिहार के विश्वविद्यालयों में पढ़ाई ज्यादा हो रही है या विवाद?
क्योंकि जब कुलपति सुरक्षित नहीं हैं…
तो छात्र, शिक्षा और विश्वविद्यालय का भविष्य कितना सुरक्षित है…
यह सवाल अब पूरे सिस्टम से जवाब मांग रहा है।

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