19 जून को छपरा में रेल मंत्री Ashwini Vaishnaw आ रहे हैं।
स्टेशन सज रहा है। मंच बन रहा है। स्वागत की तैयारियां हो रही हैं। और इसी के साथ उम्मीदों का एक लंबा प्लेटफॉर्म भी तैयार हो रहा है।
कहा जा रहा है कि छपरा से आनंद विहार के लिए नई ट्रेन की सौगात मिल सकती है। अगर ऐसा होता है तो निश्चित रूप से यह अच्छी खबर होगी। दिल्ली जाने वाले यात्रियों को फायदा मिलेगा।
लेकिन सवाल यह है कि क्या छपरा की सबसे बड़ी जरूरत आनंद विहार की ट्रेन है?
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या फिर वह ट्रेन है जो रोज़ हजारों लोगों को बिहार की राजधानी पटना तक पहुंचा सके?
छपरा जंक्शन देश के कई बड़े शहरों से जुड़ा है। यहां से दिल्ली, मुंबई और दूसरे राज्यों के लिए ट्रेनें मिल जाती हैं। लेकिन अपने ही राज्य की राजधानी पटना जाने के लिए आज भी यात्रियों को संघर्ष करना पड़ता है।
नौकरी के लिए पटना।
इलाज के लिए पटना।
पढ़ाई के लिए पटना।
कोर्ट-कचहरी और सरकारी काम के लिए पटना।
लेकिन रेल की पर्याप्त सुविधा नहीं।
नतीजा यह कि बसों का दबदबा बना रहता है। लोगों के पास विकल्प कम हैं और मजबूरी ज्यादा।
जब रेल मंत्री छपरा आ रहे हैं, जब बड़ी घोषणाओं की चर्चा हो रही है, तब जनता की मांग भी साफ है—

छपरा से पटना के बीच कम से कम चार जोड़ी नियमित ट्रेनें चलाइए।
नई ट्रेन आनंद विहार के लिए मिले, इसका स्वागत है।
लेकिन पटना के लिए रेल संपर्क मजबूत होना उससे भी बड़ी जरूरत है।
और अब बात उस मुद्दे की, जो इन दिनों स्टेशन पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
रेल मंत्री के कार्यक्रम के लिए बड़ा मंच बनाया जा रहा है। लेकिन इसी तैयारी के बीच स्टेशन परिसर में लगा ऊंचा तिरंगा फिलहाल अपनी जगह पर दिखाई नहीं दे रहा।
लोग पूछ रहे हैं—
क्या मंच बनाने के लिए तिरंगे को हटाना जरूरी था?
क्या कोई दूसरा रास्ता नहीं निकाला जा सकता था?
क्योंकि तिरंगा किसी कार्यक्रम की सजावट नहीं है।
तिरंगा इस देश की पहचान है।
तिरंगा इस देश का सम्मान है।
और जब तिरंगा अपनी जगह से हटता है तो सवाल सिर्फ लोहे के पोल का नहीं होता, भावनाओं का भी होता है।
इसलिए 19 जून को जब रेल मंत्री मंच से विकास की बातें करेंगे, तब छपरा की जनता शायद दो जवाब भी चाहती होगी—
पहला, छपरा से पटना के लिए चार जोड़ी ट्रेनें कब मिलेंगी?
और दूसरा, क्या किसी वीआईपी कार्यक्रम के लिए तिरंगे को हटाना जरूरी था?
बाकी स्वागत हो रहा है…
मंच बन रहा है…
घोषणाओं का इंतजार है…
लेकिन सवाल भी प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं।
और सवालों की अपनी एक ट्रेन होती है…
वह देर से चल सकती है,
रुक सकती है,
लेकिन मंजिल तक जरूर पहुंचती है।


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