“स्कूल या दुकान? छपरा में फीस के नाम पर खेल—DM का बड़ा एक्शन”
छपरा में इन दिनों एडमिशन का मौसम है…

लेकिन सवाल ये है—
क्या बच्चों का एडमिशन हो रहा है…
या अभिभावकों का शोषण?
सारण के जिलाधिकारी का एक आदेश आया है…
जिसमें साफ कहा गया है—
स्कूलों को
फीस, एडमिशन, यूनिफॉर्म और किताबों की पूरी लिस्ट
सार्वजनिक रूप से डिस्प्ले करनी होगी…
कोई भी स्कूल
किसी एक दुकान से
ड्रेस या किताब खरीदने के लिए
मजबूर नहीं करेगा…
और इसकी जांच करेंगे
ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर
जो इस मामले में नोडल अधिकारी बनाए गए हैं…
पटना… सिवान… और कई जिलों में
ऐसे ही आदेश लागू किए जा रहे हैं…
सख्ती की बात कही गई है…
लेकिन…
कहानी यहीं खत्म नहीं होती…
कहानी यहीं से शुरू होती है…
जिलाधिकारी के पास लगातार शिकायतें पहुंच रही थीं—
कि निजी स्कूलों में
री-एडमिशन…
ड्रेस…
किताब…
विकास शुल्क…
वार्षिक शुल्क…
नाम अलग-अलग…
लेकिन मकसद एक—
👉 अभिभावकों से पैसा निकालना…
और सबसे बड़ा आरोप—
स्कूल खुद तय कर रहे हैं—
👉 कपड़ा कहाँ से खरीदना है…
👉 किताब कहाँ से लेना है…
यानि…
ये पूरा सिस्टम “मोनोपॉली” बन चुका है…
अब जरा एक आम परिवार की हालत समझिए…
महीने की आमदनी—10 से 15 हजार…
और खर्च?
एडमिशन—25,000 से 35,000…
मासिक फीस—2,500 से 3,500…
बस का खर्च—1,000 से 1,500…
कॉपी-किताब—अलग…
ड्रेस—अलग…
एग्जाम फीस—अलग…
और फिर…
ट्यूशन—3,000 से 4,000 हर महीना…
यानि…
एक बच्चे पर 8,000 से 10,000 रुपये महीना…
अब आप ही बताइए…
ये पढ़ाई है…
या बोझ?
बिहार के हर अभिभावक की एक ही इच्छा होती है…
कि हम भले कुछ नहीं कर पाए…
लेकिन हमारा बच्चा… हमारा नाम रोशन करे…
हमारे परिवार का नाम रोशन करे…
चाहे कर्ज लेना पड़े…
लेकिन हम अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाएंगे…
यही दर्द है…
बिहार के आम आदमी का…
लेकिन सच्चाई ये है—
“इंग्लिश मीडियम” के नाम पर…
“लूट मीडियम” चल रहा है…
और खेल यहीं खत्म नहीं होता…
री-एडमिशन नहीं लेंगे…
तो क्या करेंगे?
नाम बदल देंगे…
एडमिशन फीस… बन जाएगी “ट्यूशन फीस”…
डेवलपमेंट फीस… बन जाएगी “मेंटेनेंस”…
नाम बदला…
लेकिन पैसा वही गया…
अब जरा सरकारी सिस्टम को देखिए…
टीचर बुरे नहीं हैं…
लेकिन उनके अपने बच्चे…
प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं…
तो सवाल है—
जब सिस्टम खुद अपने स्कूल पर भरोसा नहीं करता…
तो जनता अपना भरोसा कैसे बदले?
और अब सबसे बड़ा सवाल—
जब सिस्टम में भ्रष्टाचार है…
तो निगरानी कौन करेगा?
सरकारी अधिकारी भी इस तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं…
तो फिर…
उनकी निगरानी कौन करेगा?
सच ये है—
पूरे बिहार की शिक्षा व्यवस्था…
“माफियाओं के जंगल” में बदल चुकी है…
अब समाधान क्या है?
सबसे पहले—
हर चीज का रेट तय हो…
फीस का…
किताब का…
ड्रेस का…
बस का…
और ये रेट सरकार तय करे…
दूसरा—
हर स्कूल में सब कुछ डिस्प्ले हो…
ताकि पब्लिक सच्चाई जान सके…
तीसरा—
मीडिया को स्कूलों के अंदर जाने दिया जाए…
ताकि वो सच्चाई सामने ला सके…
अब वापस आते हैं
DM के इस आदेश पर…
आदेश अच्छा है…
जरूरी है…
लेकिन सवाल अभी भी खड़ा है—
क्या ये जमीन पर उतरेगा?
या फिर…
ये भी कागजों तक सीमित रह जाएगा?
आखिर में बस एक बात…
शिक्षा अगर धंधा बन गई…
तो सपने बोझ बन जाएंगे…
और उस दिन…
मां-बाप फीस भरेगा…
बच्चा डिग्री लेगा…
लेकिन सिस्टम…
फेल हो जाएगा…
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