आप देख रहे हैं “ज़मीन की खबर”।
आंगनबाड़ी… नाम तो आपने सुना ही होगा।
सरकार कहती है—यहीं से बच्चे मजबूत बनते हैं,
यहीं से राष्ट्र का भविष्य तैयार होता है।
खिचड़ी की एक थाली में पोषण,
किताब के एक पन्ने में शिक्षा,
और एक छोटे से केंद्र में बड़े सपनों की शुरुआत।
लेकिन सवाल है—
क्या ये सपने सच में पक रहे हैं… या सिर्फ कागज़ों में परोसे जा रहे हैं?
छपरा में जिलाधिकारी वैभव श्रीवास्तव ने आईसीडीएस की समीक्षा की है।
निर्देश दिए गए हैं—
केंद्र समय से खुले,
बच्चों को समय से खाना मिले,
और पढ़ाई भी हो… वो भी “गुणवत्तापूर्ण”।
अब ज़रा रुकिए…
“निर्देश” शब्द पर ध्यान दीजिए।
मतलब… अभी तक क्या हो रहा था?
पोषण ट्रैकर ऐप पर एंट्री नहीं होती,
तो अब जीपीएस फोटो अनिवार्य कर दिया गया है।
यानी… सिस्टम को भरोसा नहीं है कि केंद्र खुल भी रहे हैं या नहीं।
कहीं ऐसा तो नहीं…
कि आंगनबाड़ी के दरवाजे बंद हैं,
लेकिन ऐप में “ओपन” दिखाया जा रहा है?
टीएचआर—यानी “टेक होम राशन”…
कुछ प्रोजेक्ट्स में 10% से भी कम एंट्री।
एकमा, मढ़ौरा, मांझी, लहलादपुर…
सवाल ये नहीं है कि एंट्री कम क्यों है,
सवाल ये है कि
क्या बच्चों तक राशन पहुंच भी रहा है?
और अगर नहीं पहुंच रहा…
तो वो राशन जा कहाँ रहा है?
गंभीर कुपोषित बच्चों को NRC भेजने का निर्देश दिया गया है।
लेकिन… क्या हर मां को पता है NRC क्या होता है?
क्या उसे वहां तक पहुंचने का साधन मिला है?
कागज़ पर योजनाएं तेज़ दौड़ती हैं,
लेकिन ज़मीन पर…
कई बार बच्चे ही पीछे छूट जाते हैं।
सरकार अब कह रही है—
निजी भवनों से आंगनबाड़ी केंद्रों को सरकारी भवन में शिफ्ट किया जाए।
मतलब… अब तक जो चल रहा था,
वो “अस्थायी” था या “लापरवाही”?
और अंत में…
बाला पेंटिंग, एलईडी टीवी, आरओ…
सवाल ये नहीं है कि टीवी लगा या नहीं,
सवाल ये है—
क्या बच्चे आज भी खाली पेट तो नहीं सो रहे?
क्योंकि…
अगर खिचड़ी ठंडी है,
तो टीवी की चमक बेकार है।
ये खबर सिर्फ छपरा की नहीं है,
ये सवाल पूरे बिहार का है…
और शायद पूरे देश का भी।
कैमरे के पीछे से आवाज़ आ रही है—
“सब ठीक हो जाएगा”
लेकिन…
ज़मीन कह रही है—
“पहले देख तो लीजिए… सच क्या है।”
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