छपरा…
नाम आपने सुना होगा। नक्शे पर भी देखा होगा। लेकिन आज जो तस्वीर है, वो सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि व्यवस्था की कहानी है।
मौना चौक के पास… जमीन धीरे-धीरे धंस रही है।
जी हाँ, “धीरे-धीरे”… जैसे किसी को फर्क ही नहीं पड़ रहा।
जैसे ये खतरा नहीं, एक रोज़मर्रा की खबर बन गई हो।
खनुआ नाला का निर्माण कार्य…
जिसे समय पर पूरा होना था…
वो पिछले 6 दिनों से बंद पड़ा है।
सवाल ये नहीं है कि काम क्यों रुका…
सवाल ये है कि जब जमीन खिसक रही थी, तब सिस्टम कहां था?
स्थानीय लोग कह रहे हैं—
अगर काम समय पर होता,
तो आज मुख्य सड़क पर ये संकट नहीं मंडराता।

लेकिन…
यहाँ “अगर” से ज्यादा मजबूत है “लापरवाही”।
एक तरफ सड़क है…
जहाँ से रोज़ सैकड़ों लोग गुजरते हैं।
दूसरी तरफ धंसती हुई जमीन…
जो हर गुजरते दिन के साथ
एक बड़े हादसे का इंतजार कर रही है।
और प्रशासन?
शायद किसी रिपोर्ट का इंतजार कर रहा है।
या फिर… किसी हादसे का।
ये सिर्फ कटाव नहीं है…
ये जिम्मेदारी का कटाव है।
ये भरोसे का धंसना है।
क्योंकि जब सड़कें टूटती हैं…
तो सिर्फ रास्ते नहीं रुकते…
सवाल उठते हैं—
और जवाब… अक्सर गायब होते हैं


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