“पटना पुलिस रेड करने गई थी… लेकिन दरवाज़े पर लोकतंत्र का नहीं, ‘इजाज़त तंत्र’ का सामना हो गया…”
ज़रा इस दृश्य की कल्पना कीजिए…
वर्दी पर चमकते दो-दो, तीन-तीन स्टार… कंधे पर टंगी रायफलें… और सामने गंजी-हाफ पैंट पहने एक लड़का, जो तय कर रहा है कि कौन अंदर जाएगा और कौन नहीं।
पटना से सिर्फ 70-75 किलोमीटर दूर… उसी पटना जिले में, जहां से कानून का शासन चलाने के दावे किए जाते हैं… पुलिस रेड करने पहुंचती है, लेकिन घर में दाखिल होने से पहले खुद लाइन में लगकर अपनी तलाशी देती है।
कभी पुलिस अपराधियों की तलाशी लेती थी… यहां तस्वीर उल्टी है। सवाल यह नहीं कि तलाशी क्यों हुई… सवाल यह है कि खाकी किस मनःस्थिति में थी? डर में? दबाव में? या व्यवस्था के उस मौन में, जहां अपराध और प्रभाव की सीमा धुंधली पड़ जाती है?
वीडियो में एक आवाज़ आती है—
“जिसकी चेकिंग नहीं हुई है, वो भीतर नहीं जाएगा…”
और पुलिसवाले… मानो किसी सरकारी कार्रवाई में नहीं, बल्कि किसी निजी दरबार में दाखिल होने की अनुमति मांग रहे हों।
यह वही बिहार है, जहां अपराध पर सख्ती के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। वही पटना, जहां से बयान आते हैं— अपराधियों को छोड़ा नहीं जाएगा। लेकिन इस वीडियो ने एक असहज सवाल खड़ा कर दिया है—
अगर रेड करने गई पुलिस ही ‘स्कैन’ होगी, तो कानून किसके दरवाज़े पर खड़ा है?
अब कार्रवाई हुई है। पंचमहला और हाथीदह थाने के थानाध्यक्ष सस्पेंड कर दिए गए हैं। जांच बैठा दी गई है। लेकिन जांच से बड़ा सवाल बचा हुआ है—
क्या बिहार में कुछ दरवाज़े ऐसे भी हैं, जहां कानून दस्तक नहीं देता… पहले अनुमति
मांगता है?










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