“आज का हुसैनी कौन है?”
छपरा की सड़कों पर मोहर्रम का जुलूस निकल रहा है। मातम है, गम है, लेकिन सिर्फ आंसू नहीं हैं। एक संदेश भी है। संदेश यह कि जुल्म का मुकाबला जुल्म से नहीं किया जा सकता।
कर्बला को 1400 साल से ज्यादा बीत चुके हैं। इतिहास की किताबों में वह एक घटना भर हो सकती है, लेकिन करोड़ों लोगों के लिए वह अन्याय के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी मिसाल है। इसलिए हर साल मोहर्रम आता है, जुलूस निकलता है और लोग पूछते हैं कि आखिर कर्बला हमें आज क्या सिखाती है?
छपरा में इसी दौरान कुछ लोगों ने आरा के भरत तिवारी को “हुसैनी ब्राह्मण” बताया। बहस हो सकती है, असहमति हो सकती है, लेकिन सवाल इससे बड़ा है।

आज का हुसैनी कौन है?
क्या हुसैनी होना किसी धर्म, जाति या समुदाय की पहचान है? या फिर हर वह व्यक्ति हुसैनी है जो सत्ता, ताकत और भय के सामने सच बोलने का साहस रखता है?
कर्बला का संदेश यही था कि अन्याय के सामने सिर झुकाना नहीं है। लेकिन यह भी कि अन्याय का जवाब अन्याय से नहीं दिया जा सकता।
आज 1400 साल बाद भी लोग यह कह रहे हैं कि चाहे देश हो, राज्य हो, जिला हो या गांव — जहां जुल्म होगा, वहां विरोध की आवाज भी होगी। सवाल यह नहीं कि हुसैन कौन थे। सवाल यह है कि उनके बताए रास्ते पर चलने वाला आज कौन है?

जब कोई कमजोर के अधिकार की बात करता है… जब कोई अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है… जब कोई सच की कीमत चुकाने को तैयार होता है…
तो लोग कहते हैं, एक और हुसैनी जिंदा हो गया।
मोहर्रम का यही संदेश है। गम सिर्फ अतीत का नहीं, बल्कि वर्तमान की जिम्मेदारी का भी है। और शायद यही वजह है कि कर्बला आज भी खत्म नहीं हुई है। वह हर दौर में नए सवालों के साथ हमारे सामने खड़ी हो जाती है।

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