सरेंडर के बाद एनकाउंटर? भरत तिवारी की मौत और उठते सवाल
भरत तिवारी।
दो दिन पहले तक यह नाम शायद भोजपुर जिले के शाहपुर और उसके आसपास के गांवों तक सीमित था। लेकिन आज यह नाम पूरे बिहार में चर्चा का विषय बन चुका है।
पुलिस के अनुसार भरत तिवारी मानसिक रूप से अस्थिर था। उसे सनकी कहा गया। पागल कहा गया। उसके खिलाफ कोई बड़ा आपराधिक रिकॉर्ड भी सामने नहीं आया। लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में वह हथियार लेकर प्रशासन को चुनौती देता दिखाई दिया। पुलिस के लिए वह कानून-व्यवस्था की चुनौती था।

चुनौती था।
फिर घटनाएं तेजी से बदलीं।
पुलिस और भरत तिवारी के बीच कई घंटों तक बातचीत चली। खबरें आईं कि वह अपनी कुछ मांगों को लेकर अड़ा हुआ था। उसके पिता का दावा है कि भरत ने सरेंडर कर दिया था। लेकिन इसके बाद भी गोली चली और भरत तिवारी की मौत हो गई। इसी बिंदु पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।
अगर सरेंडर हो चुका था, तो फिर गोली क्यों चली?
और अगर पुलिस की कार्रवाई पूरी तरह नियमों के अनुसार थी, तो फिर कार्रवाई के बाद संबंधित थानाध्यक्ष समेत कई पुलिसकर्मियों को निलंबित क्यों किया गया? प्रशासन ने कुछ पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की है। यह कार्रवाई अपने आप में कई सवाल छोड़ जाती है।

उधर शाहपुर और बिलौटी गांव में तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है।
जिस युवक को कल तक सनकी, पागल और खलनायक बताया जा रहा था, उसकी मौत के बाद हजारों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। लोग विरोध कर रहे हैं। पुलिस के खिलाफ नारे लग रहे हैं। इंसाफ की मांग की जा रही है। कई जगहों पर तनाव की स्थिति बनी हुई है।
दिलचस्प बात यह है कि भरत तिवारी के कई पुराने वीडियो और तस्वीरें सामने आ रही हैं। उनमें वह समाज, युवाओं और व्यवस्था को लेकर बातें करता दिखाई देता है। उसके समर्थक उसे एक ऐसे युवक के रूप में पेश कर रहे हैं जो कुछ बदलना चाहता था। जबकि पुलिस का दावा है कि वह कानून और सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका था।
यहीं से कहानी दो हिस्सों में बंट जाती है।
एक कहानी पुलिस की है।
दूसरी कहानी जनता की है।
और इन दोनों कहानियों के बीच कहीं सच खड़ा है, जो अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है।
आज बिहार जानना चाहता है कि आखिर उस दिन हुआ क्या था? क्या यह एक वैध पुलिस कार्रवाई थी? क्या सरेंडर के बाद भी खतरा बना हुआ था? या फिर कहीं कोई ऐसी चूक हुई, जिसने एक युवक की जान ले ली?
लोकतंत्र में किसी भी एनकाउंटर के बाद सबसे जरूरी चीज तालियां नहीं, सवाल होते हैं।
क्योंकि सवाल किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं होते।
सवाल सच के पक्ष में होते हैं।
और भरत तिवारी की मौत के बाद बिहार में फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा उसी सच की हो रही है।

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