“कतरा-कतरा देकर लहू, कुछ लोग मिसाल बन जाते हैं,
वक्त गुजर जाता है लेकिन उनके सवाल अमर हो जाते हैं…”
कर्बला के दिन यह तस्वीर कुछ कह रही है…
या हुसैन… या हुसैन… के नारों के बीच निकली यह झांकी सिर्फ एक जुलूस नहीं, बल्कि एक संदेश बन गई है।

एक तरफ भगत सिंह की तस्वीर… दूसरी तरफ भरत तिवारी की तस्वीर…
लोग कह रहे हैं कि भगत और भरत में सिर्फ एक अक्षर का अंतर है। एक नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है, दूसरा आज हजारों लोगों की जुबान पर है।
कर्बला हमें सिखाती है कि सच और इंसाफ के लिए खड़े होने वालों को वक्त भुला नहीं पाता। शायद यही वजह है कि आज भी लोग अपने-अपने प्रतीकों में उसी संघर्ष और उसी जज्बे को तलाशते हैं।
जात-पात और धर्म की दीवारों से ऊपर उठती यह तस्वीर कई सवाल छोड़ रही है…
क्या यह सिर्फ एक झांकी है… या समाज के बदलते नजरिए की एक नई कहानी?
फैसला आपका…
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