1400 साल बाद भी कर्बला क्यों जिंदा है?
कल छपरा में कर्बला का जुलूस निकला। जुलूस तो हर साल निकलता है, लेकिन हर जुलूस एक जैसा नहीं होता। इस बार भीड़ थी, मातम था, या हुसैन के नारे थे, लेकिन इनके बीच कुछ सवाल भी थे जो बार-बार सुनाई दे रहे थे।

आखिर 1400 साल पुरानी एक घटना आज भी लोगों को क्यों रुलाती है?

कर्बला को सिर्फ एक धार्मिक घटना मान लेना शायद उसके अर्थ को छोटा कर देना होगा। शिया समाज के लिए यह गम का दिन है, लेकिन इसके भीतर एक सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी छिपा है। संदेश यह कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अन्याय के सामने सिर नहीं झुकाना चाहिए।
छपरा की सड़कों पर निकले जुलूस में सिर्फ मातम नहीं था, इतिहास की याद भी थी। लोग इमाम हुसैन को याद कर रहे थे। उस संघर्ष को याद कर रहे थे जिसमें संख्या कम थी, ताकत कम थी, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया गया।

इसी दौरान एक और चर्चा सुनाई दे रही थी। हुसैनी कौन है? क्या हुसैनी सिर्फ एक पहचान है या एक विचार?
बिहार में कई लोग “हुसैनी ब्राह्मण” की परंपरा का भी जिक्र करते हैं। इतिहासकारों के बीच इसके अलग-अलग मत हैं, लेकिन आम लोगों के बीच यह एक प्रतीक की तरह मौजूद है—एक ऐसा प्रतीक जो बताता है कि कर्बला की कहानी किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रही।
कल के जुलूस में कई लोगों का कहना था कि हुसैनी वह है जो अन्याय के खिलाफ खड़ा हो। जो कमजोर के साथ खड़ा हो। जो सच बोलने की कीमत चुकाने का साहस रखता हो।
शायद यही वजह है कि 1400 साल बाद भी कर्बला सिर्फ इतिहास नहीं बनी। वह हर दौर में नए सवाल लेकर लौट आती है।
आज जब समाज जाति, धर्म और राजनीतिक पहचान के आधार पर बंटा हुआ दिखाई देता है, तब कर्बला का जिक्र सिर्फ अतीत को याद करना नहीं है। यह वर्तमान से भी एक सवाल है।
क्या हम अन्याय के खिलाफ खड़े हैं?
क्या हम सच के साथ खड़े हैं?
और सबसे बड़ा सवाल…
आज का हुसैनी कौन है?
इन सवालों का जवाब हर व्यक्ति अपने अनुभव और अपने नजरिए से देगा। लेकिन इतना तय है कि छपरा की सड़कों पर निकला यह जुलूस सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं था। यह इतिहास, आस्था, राजनीति, समाज और इंसाफ की तलाश—इन सबका मिला-जुला प्रतिबिंब भी था।
पूरी कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कर्बला को समझना सिर्फ एक घटना को समझना नहीं, बल्कि उस सवाल को समझना है जो 1400 साल बाद भी जिंदा है।
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