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“छपरा की एक सुबह… जो रामनवमी की थी, लेकिन मातम में बदल गई” रामनवमी का दिन…

जब गांव में भक्ति के गीत गूंज रहे थे,
जब लोग खुश थे, त्योहार मना रहे थे…
उसी वक्त सारण के मांझी थाना क्षेत्र का मटियार गांव,
एक ऐसी खबर से कांप उठा… जिसे सुनकर कोई भी चुप नहीं रह सकता।
तीन बच्चे…
हाँ, तीन मासूम…
जिन्हें अभी जिंदगी देखनी थी, सपने पूरे करने थे…
वो सिर्फ लकड़ी लाने निकले थे।
गैस नहीं था घर में…
इसलिए सरयू नदी पार करना जरूरी था।
लेकिन किसी को क्या पता था—
यह सफर आखिरी होगा।
नदी किनारे…
एक छोटा सा पल… एक छोटी सी चूक…
और सब खत्म।
बताया जा रहा है—
एक किशोर का पैर फिसला…
वो पानी में गया… डूबने लगा…
और फिर…
दो और बच्चे… बिना सोचे… बिना डरे…
उसे बचाने के लिए कूद पड़े।
यहीं से कहानी बदल जाती है।
तीनों एक-दूसरे को बचाने की कोशिश करते रहे…
लेकिन नदी का बहाव…

उसकी गहराई…
उनकी मासूम कोशिशों से ज्यादा ताकतवर निकली।
कुछ ही पलों में…
तीनों… सरयू की लहरों में खो गए।
गांव वाले दौड़े…
शोर हुआ…
बचाने की कोशिश हुई…
लेकिन…
जब तक लोग पहुंचे…
बहुत देर हो चुकी थी।
तीन नाम—
अब सिर्फ नाम बनकर रह गए हैं।
गुंजन कुमार… (10 साल)
रागिनी कुमारी… (12 साल)
प्रियांशु कुमारी…
ये तीनों अब इस दुनिया में नहीं हैं।
सोचिए…
जिस घर से बच्चे सुबह निकले थे…
वहीं घर अब चीखों से भरा है।
मां-बाप… रो रहे हैं…
गांव… खामोश है।
रामनवमी का दिन…
जो खुशियों का होना चाहिए था…
वो मातम का दिन बन गया।
अब सवाल उठता है—
क्या ये सिर्फ एक हादसा है?
या सिस्टम की भी जिम्मेदारी है?
नदी किनारे कोई सुरक्षा क्यों नहीं?
क्यों नहीं हैं चेतावनी बोर्ड?
क्यों नहीं कोई निगरानी?
गांव वाले पूछ रहे हैं…
और शायद ये सवाल हम सबका भी है—
क्या अगली बार भी किसी को यूं ही मरना पड़ेगा…
ताकि प्रशासन जागे?

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