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दरवाजे के सामने कब्र और गांव के सामने सवाल

छपरा, सारण।
किसी गांव की पहचान उसके खेतों, गलियों और लोगों के आपसी रिश्तों से होती है। लेकिन जब एक जमीन का टुकड़ा दो समुदायों के बीच अविश्वास की रेखा बन जाए, तब मामला सिर्फ जमीन का नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक सौहार्द की परीक्षा बन जाता है।
सारण जिले के बनियापुर प्रखंड की सतुआ पंचायत में इन दिनों ऐसा ही एक विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां एक निजी भूखंड पर शव दफनाए जाने के बाद स्थानीय स्तर पर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई। एक पक्ष का कहना है कि जिस स्थान पर दफन किया गया, वह उनके आवासीय परिसर और घर के मुख्य प्रवेश द्वार के बेहद निकट है, जिससे उन्हें आपत्ति है। वहीं दूसरा पक्ष उस भूमि को अपने उपयोग और अधिकार क्षेत्र का हिस्सा बता रहा है।
मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह विवाद दो अलग-अलग समुदायों से जुड़े परिवारों के बीच है। ऐसे मामलों में तथ्य से अधिक अफवाहें नुकसान पहुंचाती हैं और कई बार वास्तविक समस्या से बड़ा संकट पैदा कर देती हैं।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन सक्रिय हुआ है। छपरा से एसडीएम सहित प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों की टीम मौके पर पहुंची। अधिकारियों ने दोनों पक्षों, ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों से बातचीत कर पूरे मामले की जानकारी ली। प्रशासन का कहना है कि जमीन की प्रकृति, उसके पूर्व उपयोग, सीमांकन और संबंधित अभिलेखों की जांच की जा रही है। जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा।
यहां एक बात स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत है कि किसी भी भूमि का उपयोग, चाहे वह आवासीय हो, धार्मिक हो या सार्वजनिक, कानून और राजस्व अभिलेखों के अनुसार तय होता है। कौन-सी जमीन कब्रिस्तान है, कौन-सी आवासीय है और उसका वास्तविक सीमांकन क्या है, इसका अंतिम निर्धारण प्रशासनिक जांच और राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा। इसलिए इस मामले में किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम सत्य मान लेना जल्दबाजी होगी।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जमीन नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास है। गांवों में वर्षों से साथ रहने वाले लोग जब आमने-सामने खड़े हो जाते हैं, तो विवाद का दायरा सिर्फ एक परिवार या एक भूखंड तक सीमित नहीं रहता। इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है।
सतुआ पंचायत में फिलहाल प्रशासन की कोशिश तनाव को कम करने और संवाद का रास्ता निकालने की है। स्थानीय जनप्रतिनिधि भी दोनों पक्षों को समझाने में जुटे हुए हैं। अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे अफवाहों से बचें, सोशल मीडिया पर भ्रामक सामग्री साझा न करें और जांच पूरी होने तक संयम बनाए रखें।
क्योंकि किसी भी गांव की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामाजिक समरसता होती है। जमीन का विवाद अदालत या प्रशासन सुलझा सकता है, लेकिन रिश्तों में आई दरार को भरने में वर्षों लग जाते हैं।
इसलिए सतुआ का यह मामला सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि यह याद दिलाने वाला प्रसंग है कि कानून अपना काम करेगा, प्रशासन अपनी जांच करेगा, लेकिन समाज को भी यह तय करना होगा कि वह विवाद को बढ़ाना चाहता है या समाधान का रास्ता चुनना चाहता है।
फिलहाल सभी की निगाहें प्रशासनिक जांच और दोनों पक्षों के बीच बन सहमति पर टिकी हैं।

 

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