छपरा है।
हाँ, वही छपरा… जहाँ शहर अब रास्तों से नहीं, बैरिकेडिंग से पहचाना जाने लगा है।
अगर आप मोना चौक से निकलिए… सलेमपुर जाइए… गांधी चौक की तरफ बढ़िए… या म्युनिसिपल चौक से साहेबगंज की ओर आइए… हर रास्ता जैसे आपसे एक सवाल पूछ रहा है—
“कहाँ जाएंगे आप?”

क्योंकि शहर में इस वक्त सड़क कम, निर्माण ज्यादा दिख रहा है।
एक तरफ डबल डेकर का सपना है… दूसरी तरफ बुडको की खुदाई… और तीसरी तरफ नगर निगम का निर्माण कार्य।
विकास हो रहा है… ये बात कही जा रही है।
लेकिन सवाल ये है कि क्या विकास सिर्फ मशीनों की आवाज़ का नाम है?
क्या विकास का मतलब ये है कि पूरा शहर एक साथ खोद दिया जाए?
डबल डेकर ब्रिज… ऊँचाई का प्रतीक बताया जा रहा है।
लेकिन नीचे खड़े व्यापारी पूछ रहे हैं—
“हमारी दुकान की ऊँचाई नहीं, रोज़ी कैसे बचेगी?”
कई दुकानों पर ग्राहक नहीं पहुँच रहे।
कुछ दुकानदार इंतज़ार में बैठे हैं… सुबह से शाम तक।
कुछ ने दुकान बंद करने का मन बना लिया है।
और कुछ… पलायन की सोच रहे हैं।
गाँव से आने वाले लोग कहने लगे हैं—
“छपरा मत जाइए… वहाँ पहुँचना ही मुश्किल है।”
विकास ज़रूरी है।

बहुत ज़रूरी है।
लेकिन क्या विकास का कोई सिस्टम नहीं होना चाहिए?
कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए?
क्या हर काम एक साथ शुरू कर देना ही व्यवस्था है?
नालों का निर्माण हो रहा है।
लेकिन सवाल उठ रहे हैं—
क्या सही एलाइनमेंट है?
क्या गुणवत्ता है?
या जल्दी में बस काम पूरा दिखाने की कोशिश हो रही है?
ये सवाल सिर्फ विपक्ष का नहीं है…
ये सवाल उस आम आदमी का है, जो कीचड़ से होकर दुकान तक पहुँचता है।
जो जाम में फँसकर अस्पताल जाता है।
जो हर दिन इस शहर में जीने की कोशिश करता है।
और इसलिए, सारण के जिलाधिकारी
Vaibhav Srivastava
से आम जनता की एक अपील है—
एक बार निकलकर देखिए…
फाइलों से बाहर…
सड़कों पर आइए…
इन निर्माण कार्यों का निरीक्षण कीजिए।
क्योंकि विकास अगर जनता को दर्द देने लगे…
तो फिर सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है।
क्योंकि ये छपरा है… और छपरा अभी विकास और परेशानी— दोनों के बीच खड़ा है।

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