“भारत में भूख का भी एक वर्ग संघर्ष है। अमीर की प्लेट में प्रोटीन होता है, मिडिल क्लास की रसोई में हेल्थ… और गरीब के गिलास में—सत्तू। जी हां, सत्तू। वही सत्तू जिसे शहरों ने अब ‘सुपरफूड’ कहना शुरू कर दिया है, जिसे बड़े-बड़े कैफे नए नाम देकर बेच रहे हैं। लेकिन बिहार के गांवों में, फुटपाथों पर, रिक्शा चलाने वाले हाथों में, ठेला खींचते कंधों में… सत्तू फैशन नहीं है जनाब, सत्तू जरूरत है।

जरा इस दृश्य को गौर से देखिए। ये सिर्फ खाना नहीं है। ये गरीब की जेब का हिसाब है, ये भूख का गणित है। क्योंकि दोपहर के दो बजे हैं। आसमान आग उगल रहा है, सड़क तप रही है, पसीना कमीज से उतरकर शरीर से जवाब मांग रहा है। और सामने खड़ा है एक आदमी… एक रिक्शावाला, एक मजदूर, एक ठेला खींचने वाला… जिसकी रोज की कमाई कभी 500 रुपये, कभी 300, और कभी-कभी 200 भी नहीं होती।
लेकिन घर तो जाना है। बच्चे इंतजार करेंगे। पत्नी पूछेगी—‘आज कितना बचा?’ और इसी सवाल के बीच जेब टटोली जाती है। 20 रुपये… 25 रुपये… अब सवाल ये नहीं कि क्या खाएंगे, सवाल ये है कि पेट कैसे भरेगा? और जवाब अक्सर एक ही निकलता है—सत्तू।

फुटपाथ किनारे एक दुकान। एक डिब्बे में चने का सत्तू, थोड़ा नमक, थोड़ी मिर्च, अगर किस्मत अच्छी हुई तो थोड़ा प्याज… और फिर एक गिलास में घुलकर तैयार होता है गरीब आदमी का लंच। सत्तू सिर्फ खाना नहीं है जनाब… ये भूख के खिलाफ गरीब की सबसे सस्ती लड़ाई है। ये पेट भी भर देता है और गर्मी में शरीर को ठंडा भी रखता है।
मिडिल क्लास इसे हेल्थ मानता है। अमीर इसे प्लेट में सजाकर लिट्टी-सत्तू, सत्तू पराठा और ऑर्गेनिक फूड बना देता है। लेकिन फर्क समझिए… एक आदमी स्वाद के लिए खा रहा है, दूसरा सिर्फ इसलिए कि भूख उसे बेइज्जत न कर दे।
जब सत्तू का पहला निवाला मुंह में जाता है ना… तो जीभ भी छोटी-सी ख्वाहिश करती है—थोड़ा अचार मिल जाए, थोड़ी हरी मिर्च हो जाए, थोड़ा प्याज मिल जाए। लेकिन गरीब आदमी की जिंदगी में हर स्वाद किस्मत से मिलता है।
हम बात करते हैं विकसित भारत की… विकसित बिहार की… लेकिन सवाल ये भी है—क्या विकास उस मजदूर की थाली तक पहुंचा? या वो आज भी पसीना बहाकर सिर्फ इतना कमा पा रहा है कि सत्तू खाकर भूख को थोड़ी देर चुप करा सके?

सत्तू जनाब… सिर्फ भोजन नहीं है। ये गरीब की इज्जत है, उसकी मजबूरी का स्वाद है और इस समाज के फर्क का सबसे सीधा आईना भी।
और आखिर में… बशीर बद्र का एक शेर—
“कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूं कोई बेवफा नहीं होता…”
जनाब… कोई आदमी शौक से सत्तू नहीं खाता। कई लोग मजबूरी में भूख को समझाने के लिए भी खाते हैं। ये कहानी सत्तू की नहीं… उस इंसान की है… जो हर दिन पसीना बेचकर शाम को घर लौटता है।” 🎙️
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