जरा सोचिए…
एक मोहल्ला है। रात के दो बजे हैं। सब सो रहे हैं। अचानक गली में भौंकने की आवाज़ आती है। आप खिड़की से झांकते हैं… वही गली का कुत्ता… जिसे आप रोज़ देखते हैं। जो हर आने-जाने वाले को पहचानता है। कभी चोर दिखे तो सबसे पहले वही शोर मचाता है… और कभी-कभी बच्चों के पीछे भागता भी है।
लेकिन अब… देश की सबसे बड़ी अदालत ने आवारा कुत्तों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। और बहस सिर्फ़ कुत्तों की नहीं… इंसानियत और इंसानी सुरक्षा—दोनों की है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है—देश में बढ़ती डॉग बाइट यानी कुत्ते काटने की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चे घायल हुए… महिलाएं डरीं… कई जगहों पर रेबीज का खतरा बढ़ा। अदालत ने माना कि व्यवस्था कमजोर है।

लेकिन सवाल ये भी है—क्या हर गली का कुत्ता खूंखार होता है?
क्या जो कुत्ता सालों से उसी मोहल्ले में रह रहा है… अपना ठिकाना जानता है… लोगों को पहचानता है… क्या वह अचानक दुश्मन बन जाता है?
सच ये है कि हजारों कुत्ते ऐसे हैं… जो भूख, प्यास और लात-डंडों के बीच जिंदगी काटते हैं। वे किसी से दया नहीं… बस जीने की जगह मांगते हैं। एक कटोरी पानी… थोड़ा भोजन… और इंसानों के बीच थोड़ी इंसानियत।
लेकिन दूसरी सच्चाई भी उतनी ही कड़वी है। अगर उन्हीं में से कोई एक पगला जाए… रेबीज संक्रमित हो जाए… या हमला कर दे… तो उसका खामियाजा मासूम लोग भुगतते हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा—नसबंदी हो… टीकाकरण हो… खतरनाक कुत्तों को शेल्टर में रखा जाए… और नगर निगम जिम्मेदारी निभाए।

अब बड़ा सवाल—
आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
क्या सिर्फ़ कुत्तों को दोष देकर काम चल जाएगा?
या फिर नगर निगम, पशु कल्याण बोर्ड और सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी… जहां इंसान भी सुरक्षित रहे और बेजुबानों पर भी जुल्म न हो?
क्योंकि बात सिर्फ़ कुत्तों की नहीं है… बात उस समाज की है… जो तय करेगा कि डर और दया—दोनों के बीच इंसानियत को कैसे बचाया जाए।

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