छपरा का जयप्रकाश विश्वविद्यालय परिसर…
जहाँ किताबों की बात होनी चाहिए, क्लासरूम की आवाज़ गूंजनी चाहिए, वहाँ आज धरना है। धरना उन लोगों का… जो कॉलेजों को चलाते हैं, लेकिन खुद का घर चलाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
ये बिहार राज्य संबंध डिग्री महाविद्यालय शिक्षक-शिक्षकेत्तर कर्मचारी महासंघ के लोग हैं। आरोप है कि अनुदान से चलने वाले कॉलेजों को समय पर पैसा नहीं मिलता। और जब कॉलेज को अनुदान नहीं मिलता… तो शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन भी अटक जाता है।

ज़रा सोचिए… जो शिक्षक समाज को पढ़ाता है, जो कर्मचारी शिक्षा व्यवस्था को संभालता है… वही अगर महीनों वेतन के इंतज़ार में रहे, तो उसके घर का चूल्हा कैसे जलेगा? बच्चों की फीस कैसे जाएगी? दवा, राशन और रोज़मर्रा की ज़रूरतें कैसे पूरी होंगी?
धरना दे रहे लोगों का कहना है कि वेतन नहीं मिलने से भुखमरी जैसी स्थिति बन जाती है। यह सिर्फ़ पैसों का मामला नहीं है… यह उस व्यवस्था का सवाल है जो शिक्षा के नाम पर संस्थान तो चला रही है, लेकिन उन लोगों को समय पर उनका हक़ नहीं दे पा रही जो इस व्यवस्था की रीढ़ हैं।
सवाल सिर्फ़ इतना है…

क्या शिक्षा व्यवस्था ऐसे चलेगी?
क्या शिक्षक और कर्मचारी हर महीने वेतन के लिए सड़क पर उतरेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल…
क्या सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन इस आवाज़ को सुनेंगे… या फिर यह धरना भी खबरों की भीड़ में कहीं दब जाएगा?

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