आवाज़ ज़रा गौर से सुनिए…
सारण के जलालपुर में पूर्व मुख्यमंत्री Nitish Kumar लोककवि, पूर्वी धुन के जनक और स्वतंत्रता सेनानी Mahendra Mishra की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने पहुंचे। मंच सजा, सम्मान हुआ, श्रद्धांजलि दी गई, तस्वीरें खिंचीं।
लेकिन इसी समारोह में एक सवाल भी खड़ा हो गया।
महेंद्र मिश्र के परपोते अपने पूर्वज से जुड़े कुछ मुद्दों और मांगों को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचाना चाहते थे। वे दरख्वास्त देना चाहते थे, लेकिन न तो उनकी मुलाकात हो सकी और न ही उनकी बात किसी जिम्मेदार व्यक्ति तक पहुंच पाई।
विडंबना देखिए…
जिस महापुरुष को सम्मान देने के लिए बड़े-बड़े नेता पहुंचते हैं, उसी महापुरुष के परिवार के लोग अगर अपनी बात कहने का अवसर भी न पा सकें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सम्मान सिर्फ प्रतिमा तक सीमित है या परिवार और विरासत तक भी पहुंचता है?
श्रद्धांजलि तब और सार्थक होती है, जब महापुरुषों के विचारों के साथ-साथ उनके परिवार और उनकी विरासत को भी सम्मान मिले।
आज जलालपुर से उठ रहा सवाल यही है— क्या केवल माल्यार्पण ही पर्याप्त है, या उन लोगों की आवाज भी सुनी जानी चाहिए जो उस विरासत को आज तक संभाले हुए हैं?
सोचिएगा जरूर…।



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