एक दिन से बइठल बानीं बाबूजी, हमारो सुन लीं…” — भीड़ में खड़ा एगो बुजुर्ग माई के ई करुण पुकार स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के कान तक पहुंचल।
माई हाथ जोड़के विनती करे लगलीं। मंत्री जी रुकलें, बात सुनलें, अउर खाली आश्वासन देके आगे ना बढ़लें। ऊ खुदे बुजुर्ग महिला के हाथ पकड़के डॉक्टर लगे ले गइलें आ इलाज के व्यवस्था करवलें।

राजनीति में एह तरह के दृश्य रोज-रोज देखे के ना मिले ला। एही कारण बा कि निशांत कुमार धीरे-धीरे अपना एगो अलग पहचान बनावत नजर आ रहल बाड़ें। बिहार के आम लोग के बीच उनकर ई सहजता, संवेदनशीलता आ जमीन से जुड़ल व्यवहार लोगन के खूब भा रहल बा।

सवाल राजनीति के ना, संवेदना के बा। आ जब सत्ता में बइठल आदमी भीड़ में खड़ा सबसे कमजोर इंसान के हाथ पकड़ लेवे, त उ दृश्य लोग देर तक याद रखेला।

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