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“आज का छपरा या 90s का छपरा? | 500 करोड़ का शहर फिर भी अंधेरे में!” ⭐

एक शायर ने शहरों की खामोशी पर क्या खूब कहा है—
‘कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए,
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए…’
ये छपरा है… और ये कोई आम सड़क नहीं।
नगर पालिका चौक से लेकर डीएम कार्यालय, एसपी कार्यालय होते हुए साहिबगंज तक जाने वाली वो सड़क… जिसे शहर की धड़कन कहा जाता है।
यही रास्ता प्रशासन का भी है… व्यापार का भी… और आम जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का भी।

लेकिन शाम के 7 बजते ही…
इस सड़क की कहानी बदलने लगती है।
चारों तरफ़ गाड़ियों की आवाजाही है… दुकानें खुली हैं… लोग मौजूद हैं…
फिर भी एक सवाल हवा में तैरता है—
क्या बिहार के एक प्रमुख शहर की तस्वीर ऐसी होनी चाहिए?
अगर फुटपाथ के दुकानदार अपनी दुकानों की रोशनी सड़क पर नहीं फैलाते…
तो शायद ये छपरा 2026 नहीं… 90 के दशक का वही शहर लगता…
जब बिजली कम… और जनरेटर की टिमटिमाती रोशनी ज़्यादा दिखाई देती थी।
नगर निगम के अधिकारी हों… या महापौर…
हर बार दावे सुनाई देते हैं—

ग्रीन सिटी बनाएंगे… क्लीन सिटी बनाएंगे… शहर की तस्वीर बदल देंगे।
लेकिन सवाल ये है—
क्या शहर सिर्फ़ नारों से बदलता है?
शहर के कई हिस्सों में हाई मास्क लाइटें लगी हैं…
पोल वाली स्ट्रीट लाइटें भी हैं…
लेकिन रात होते ही कई इलाकों में अंधेरा, रोशनी पर भारी पड़ता दिखता है।
शहर के प्रमुख व्यापारी कहते हैं—
“लगता है छपरा शहर में कोई देखरेख करने वाला ही नहीं बचा… रात होते ही शहर अंधेरे के भरोसे छोड़ दिया जाता है।”
वहीं नगर पालिका चौक के एक व्यापारी की बात सुनिए…
व्यंग्य में वो कहते हैं—

रात के 8 बजे के बाद म्युनिसिपल चौक पर आदमी कम… भूत ज़्यादा लोटता है।”
सुनने में ये तंज़ लग सकता है…
लेकिन इसके पीछे शहर का दर्द छिपा है।
जिस चौक से शहर की रफ्तार तय होती है…
जहाँ दिन में हजारों लोग गुजरते हैं…
वहीं रात में अंधेरा पसरा दिखे… तो सवाल उठना लाज़मी है।
कई हाई मास्क लाइटें लगीं…
महंगी-महंगी लाइटों के नाम पर योजनाएं बनीं…
करोड़ों का बजट खर्च हुआ…
लेकिन आज लोग पूछ रहे हैं—
“वो रोशनी आखिर गई कहां?”
क्या इन लाइटों की निगरानी हुई?
क्या रखरखाव की जिम्मेदारी तय की गई?
क्या जिन ठेकेदारों को काम मिला… उनसे कभी जवाब मांगा गया?
क्योंकि विकास सिर्फ़ पोल खड़ा कर देने से नहीं होता…
उसे साल-दो साल तक चलाना… उसकी निगरानी करना… और जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी होता है।

बिजली विभाग की हालत पर भी लोगों की नाराज़गी कम नहीं।
अगर रात में मोहल्ले की बिजली चली जाए…
तो शिकायत करते रह जाइए… फोन मिलाते रह जाइए…
लेकिन कई बार सुबह तक अंधेरे में रहने की मजबूरी बन जाती है।
सफाई व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है।
कई मोहल्लों में समय पर कचरा नहीं उठता।
मच्छरों का आतंक अलग…
निगम को टैक्स चाहिए…
लेकिन जनता पूछ रही है—
“बदले में मिलेगा क्या?”
रोशनी? अधूरी।
सफाई? सवालों में।
जवाबदेही? शायद सबसे कम।
और फिर सबसे बड़ा सवाल—
500 करोड़ के बजट वाले शहर की तस्वीर ऐसी क्यों है…
कि बुनियादी सुविधाओं के लिए भी लोगों को इंतज़ार करना पड़ता है?”
छपरा बदलने की बात हर चुनाव में होती है…
हर बार नए वादे आते हैं…
लेकिन शहर आज भी पूछ रहा है—
“जनाब… बदल कौन रहा है?
शहर… या सिर्फ़ कुर्सियाँ?”
और अब कहानी में एक नया किरदार है—
Gen Z।
वो पीढ़ी… जो सिर्फ़ भाषण नहीं सुनती… सवाल भी पूछती है।
जो वादों से पहले काम देखना चाहती है।
जो शहर की सड़क, बिजली, सफाई और व्यवस्था को मुद्दा मानती है।
और शायद अब सवाल सिर्फ़ अंधेरे का नहीं…
सोच के उजाले का भी है।
बदलाव के लिए आतुर Gen Z…
क्या इस बार पुरानी राजनीति से आगे बढ़कर नया विकल्प चुनेगी?
या फिर वही अंधेरा…
सिर्फ़ नए वादों की रोशनी में छुपा दिया जाएगा?
और आखिर में…
“हर पीढ़ी शिकायत करती है…
लेकिन कुछ पीढ़ियाँ बदलाव लिखती हैं।
अब देखना ये है…
Gen Z सिर्फ़ पोस्ट करेगी…
या छपरा की कहानी भी बदलेगी…”

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