ट्रेन में सफर… या डर का सफर?
एक परिवार ट्रेन में सफर कर रहा था। पति भी दरोगा, पत्नी भी दरोगा। साथ में चार साल का मासूम बेटा। गया से ड्यूटी पर लौट रहे थे। लेकिन सफर मंजिल तक नहीं, मारपीट तक पहुंच गया।

मामला गया–हावड़ा एक्सप्रेस के B2 कोच का है। आरोप है कि नवादा स्टेशन से कुछ युवक कोच में चढ़े और दरोगा दंपति की आरक्षित सीट खाली कराने लगे। सीट को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते मारपीट में बदल गया। सवाल यह है कि जब ट्रेन में हेल्पलाइन है, टीटीई है और सुरक्षा व्यवस्था है, तो फिर मदद क्यों नहीं मिली?

पीड़ित दंपति, जो झारखंड के पाकुड़ में दरोगा के पद पर तैनात हैं, का आरोप है कि काशीचक स्टेशन पहुंचने से पहले उन्हें लगातार धमकियां दी गईं। हालात ऐसे बने कि ट्रेन की वैक्यूम तक काट दी गई। इसके बाद दोनों दरोगा अपने चार साल के मासूम बेटे के साथ इंजन के आगे खड़े हो गए और इंसाफ की मांग करने लगे।
करीब एक घंटे तक गया–हावड़ा एक्सप्रेस काशीचक स्टेशन पर खड़ी रही। बाद में रेलवे पुलिस मौके पर पहुंची, समझाने का प्रयास किया और काफी मशक्कत के बाद मामला शांत हुआ। तब जाकर ट्रेन को रवाना किया गया।
लेकिन सवाल अब भी वही है—अगर ट्रेन में सफर कर रहे दो पुलिस अधिकारी और उनका मासूम बेटा भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे, तो आम यात्रियों की सुरक्षा का भरोसा आखिर किसके भरोसे है?

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